रामायण क्या है ?
रामायण क्या है ?
• रामायण महज एक काल्पनिक कहानी है। जिसको वास्तविक घटना साबित करने के लिए आज मनुवादी लोग हजारों तरह के ढोंग और पाखंड कर रहे है। कहानी के साथ कहानियां जोड़ कर देश के मूलनिवासियों को बेवकूफ बना कर जबरदस्ती हिन्दू धर्म को मानने पर मजबूर कर रहे है। राजा पुष्यमित्र शुंग के दरबार के एक कवि "वाल्मीकि ने रामायण नामक काल्पनिक कहानी लिखी थी और मनुवादियों ने उस कहानी का प्रचार-प्रसार किया। इसी कहानी के दम पर आज भी मनुवादी लोग इस देश के सीधे-साधे मूलनिवासियों पर मानसिक रूप से राज कर रहे है और मनुवादियों के जाल में फंसे सभी मूलनिवासी आज भी हिन्दू धर्म को निभा रहे है। आज रामायण के साथ हजारों कहानियां जोड़ी जा चुकी है और लगातार जोड़ी जा रही है। काल्पनिक तथ्यों के आधार पर रामायण को देश के इतिहास तक से जोड़ा जा चूका है। लेकिन तार्किक दृष्टि से देखा जाये तो आसानी से समझ में आ जाता है कि रामायण महज एक काल्पनिक कहानी है। मैं इस लेख के माध्यम से इस देश के सभी मूलनिवासियों को रामायण की सच्चाई से रूबरू करवाना चाहती हूँ कि आखिर सच्चाई क्या है?
आज से बहुत समय पहले लगभग 269-185 ईसा पूर्व में भारत एक समृद्ध बौद्ध राज्य था। उस समय भारतवर्ष (वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भूटान, बांग्लादेश, ईरान और नेपाल) पर बौद्ध राजाओं का राज था। भारतवर्ष नामक देश की राजधानी का नाम पाटलिपुत्र था। भारतवर्ष में बौद्ध राज्य की स्थापना क श्रेय चक्रवर्ती सम्राट अशोक को जाता है। सम्पूर्ण विश्व में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय भी सम्राट अशोक और उनके वंशजों को जाता है। सम्राट अशोक के मौर्य वंश में कुल दस राजा (अशोक) के बड़े भाई सुसीम को भी राजा माना है क्योंकि वो मौर्य वंश का प्रभारी राजा रहा था) हुए और जिनमें अंतिम राजा का नाम सम्राट बृहद्रत्त था। 187-185 ईसा पूर्व में भारत पर सम्राट बृहद्रत्त का राज था और लोग जातिवाद की समस्या से मुक्त थे। देश में समता, समानता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित शासन था। बौद्ध राज्य (मौर्य साम्राज्य) की शासन व्यवस्था की कीर्ति सम्पूर्ण विश्व में फैल चुकी थी। सामाजिक और शहरी व्यवस्था भी उच्च स्तर की थी, जिसे आज सभी विकसित देशों ने अपनाया हुआ है। यह व्यवस्था बौद्ध राजाओं के समय भारत में विद्यामान थी और बौद्ध शासन काल में विकसित हुई थी। शहरों का निर्माण आधुनिक शैली में किया गया था। देश में धर्म के नाम पर होने वाले आडम्बर, पाखंड और अन्धविश्वास समाप्त हो गए थे, पूरी दुनिया सम्राट अशोक के भारतवर्ष को "विश्वगुरु" मान चुकी थी। पश्चिम देशों के लोग भारतवर्ष में आकर यहाँ की व्यवस्था का अध्ययन करते थे और अपने देशों में वापिस लौटकर वो ही व्यवस्था स्थापित करते थे। वास्तव में कहा जाये तो बौद्ध राजाओं का समय ही वो समय था जब भारत को "सोने की चिड़िया" कहा जाता था।
बौद्ध राजाओं के समय भारतवर्ष में आडम्बर और पाखंड समाप्त होने से हिन्दू धर्म खतरे में आ गया था। भारतवर्ष के लोग मनुवादियों के हिन्दू धर्म को छोड़ कर मानवता पर आधारित बौद्ध धर्म की ओर जा रहे थे। इसका कारण यह था कि मनुवादी लोग धर्म के आधार पर लोगों का शोषण करते थे। ये मनुवादी लोग अपने आपको सबसे सर्वोपरि और विश्व का मालिक बताते थे। ये मनुवादी लोग धर्म, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर व्यभिचार, बलात्कार और अत्याचार करते थे (ज्यादा जानकारी के लिए आप सभी ऋग्वेद" का अध्ययन कर सकते हो)। उस वक्त लोग जातिवाद और ब्राह्मणवाद के विरोधी हो गए थे। ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था को भारतवर्ष के निवासियों ने नकार दिया था। सभी भारतवासी समता, समानता, न्याय और बधुत्व के आधार पर स्थापित बौद्ध धर्म को मानने लग गए थे। इसलिए लोग पाखंड, आडम्बर और झूठी कहानियों पर आधारित हिन्दू धर्म को मानना छोड़ रहे थे। बौद्ध राजाओं के राज में और बौद्ध धर्म के अनुसार उस वक्त सभी लोग समानता, समता, बंधुत्व और न्याय के शासन के अंतर्गत शासित थे, जो मानवता के आधार पर भी न्यायोचित भी था।
ब्राह्मणों के बुरे दिन शुरू हो चुके थे क्योंकि भारतवर्ष के मूलनिवासियों ने मंदिरों में जाना बंद कर दिया था। दान, कर्मकांडों और पूजा पाठ आदि की व्यवस्था भारत से लुप्त होती जा रही थी। जिसके कारण ब्राह्मणों के भूखे मरने और मेहनत करने के दिन आने लगे थे क्योंकि ब्राह्मणों के सभी प्रकार के मुफ्त में धन और सम्मान हासिल करने की प्रथाओं के बंद होने के कारण ब्राह्मणों को भी मेहनत करनी पड़ रही थी। भारतवर्ष के मूलनिवासी ब्राह्मणों के धर्म, प्रथाओं, ग्रंथों और परम्पराओं के विरोधी हो गए थे और हिन्दू धर्म पूरी तरह खतरे में पड़ गया था। ऐसे में मनुवादियों को चिंता हुई कि अगर यही हाल रहा तो हिन्दू धर्म समाप्त हो जायेगा और लोग ब्राह्मणों (मनुवादियों) की सर्वोपरिता को नहीं मानेंगे। मनुवादियों को डर सताने लगा कि भारतवर्ष के लोग झूठ, आडम्बर और पाखंड पर आधारित हिन्दू धर्म के वेदों, पुराणों को नहीं मानेंगे और उनके पूर्वजों के द्वारा स्थापित वर्णव्यवस्था भी समाप्त हो जायेगी। मनुवादी लोग भारतवर्ष में वर्ण व्यवस्था को किसी भी हाल में समाप्त नहीं होने देना चाहते थे क्योंकि मनुवादियों का सोचना था कि जब तक वर्ण व्यवस्था है तब तक मनुवादी लोग सर्वोपरि है।
मनुवादियों ने अपने हिन्दू धर्म को बचाने के लिए बौद्ध राजा बृहद्र को मारने की एक योजना बनाई। मनुवादियों ने बृहद्रत्त को मारने का कार्य पुष्यमित्र शुंग को दिया। पुष्यमित्र शुंग एक ब्राह्मण था और मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बौद्ध राजा बृहद्रत्त की सेना में सेनापति भी था। मनुवादियों की योजना अनुसार पुष्यमित्र शुंग ने सैन्य समीक्षा के दौरान बृहद्रत्त की धोखे से हत्या कर दी और पाटलिपुत्र पर कब्ज़ा करके स्वयं को राजा घोषित कर दिया। पाटलिपुत्र का नाम बदलकर अयोध्या रख दिया गया। अयोध्या का शाब्दिक अर्थ भी "बिना युद्ध के जीती गई राजधानी" ही होता है। पाटलिपुत्र को जीतने के लिए पुष्यमित्र शुंग ने कोई युद्ध नहीं किया था बल्कि षड्यंत्र से हासिल किया था। ब्राह्मणों का यह षड्यंत्र सफल रहा और देश पर एक बार फिर से ब्राह्मणों का राज स्थापित हो गया। उसके बाद बौद्ध धर्म के लोगों पर ब्राह्मणों के अत्याचार शुरू हुए। लाखों बौद्ध भिक्षुओं को जबरदस्ती हिन्दू धर्म मानने पर मजबूर किया गया। जिन्होंने ब्राह्मण धर्म को मानने से इनकार किया उन लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। बहुत से बौद्ध भिक्षु देश छोड़ कर भागने पर मजबूर हो गए। जो लोग भारत में ही रह गए उन लोगों पर हिन्दू धर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था को लागू किया गया। देश के मूलनिवासियों को कई टुकड़ों में बाँट दिया गया। बौद्ध भिक्षुओं के द्वारा स्थापित विद्यालयों को भी आग के हवाले कर दिया गया, जिससे बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लिखी गई लाखों किताबें भी आग में जल कर स्वाह हो गई।
मनुवादियों को डर था कि इस भारतवर्ष के मूलनिवासी एक ना हो जाये और ब्राह्मणों के खिलाफ आवाज ना उठा दे, इसीलिए देश के मूलनिवासियों को लगभग 6743 जातियों और उपजातियों में बाँट दिया गया। बौद्ध धर्म के अनुयायियों और बौद्ध लोगों के पूरी तरह
दमन के बाद पुष्यमित्र शुंग ने अपने राजकवि वाल्मीकि को आदेश दिया कि एक ऐसी कहानी लिखी जाये, जिससे पुष्यमित्र शुंग सदा के लिए अमर हो जाये। वाल्मीकि ने पुष्यमित्र शुंग को राम नाम से संबोधित किया और रामायण नाम की एक काल्पनिक कहानी की रचना की।
इस काल्पनिक रामायण का उद्देश्य मूलनिवासियों के मन में एक बार फिर देवातावाद या अवतारवाद या ब्राह्मणवाद या मनुवाद का डर बैठाना था। ब्राह्मणों के विष्णु भगवान और ब्राह्मणवाद का अस्तित्व भारत में बौद्ध धर्म के उदय के बाद पूरी तरह समाप्त हो गया था। लोगों ने विष्णु को भगवान और ब्राह्मणों के अवतारवाद को मानना बंद कर दिया था। गौतम बुद्ध ने जो क्रांति की मशाल जलाई थी उसके प्रकाश के आगे ब्राह्मणवाद हर प्रकार से मूलनिवासियों को दबाने में असफल हो गया था। लोग काल्पनिक कहानियों को मानना छोड़ कर सच, समता, न्याय और बंधुत्व के मार्ग पर चलने लग गए थे। उस समय पुष्यमित्र शुंग के कहने पर वाल्मीकि नामक एक ब्राह्मण ने फिर से ब्राह्मणवाद को स्थापित करने और मूलनिवासियों के मन में अवतारवाद का भय बिठाने के लिए रामायण जैसी ब्राह्मणवादी और काल्पनिक कहानी लिखी। रामायण लेखन पुष्यमित्र शुंग की एक चाल थी जिससे मूलनिवासी लोग धर्म के नाम से डरे और वर्ण व्यवस्था को अपना ले। वाल्मीकि के रामायण लिखने का प्रभाव यह हुआ कि भारत के सभी लोगों ने पुष्यमित्र शुंग को राम समझ कर भगवान मानना शुरू कर दिया और बृहद्रत्त को रावण समझ कर बुरा समझना शुरू कर दिया। पुष्यमित्र शुंग के समय से ही ब्राह्मणों ने चतुराई से हिन्दू धर्म के नाम पर पाखंड करके और आडम्बर को बढ़ावा देकर रामायण को हमेशा सच साबित करने की कोशिश जारी रखी है। भारतवर्ष के मूलनिवासी लोग ब्राह्मणों की चतुराई को समझ नहीं सके और आज भी किसी ना किसी तरह से रामायण को सच मानते है।
प्रिय पाठकों स्पष्ट है कि रामायण वास्तव में एक कहानी है, जिसके नाम पर पाखंड और आडम्बर करके मनुवादियों ने इस देश के मूलनिवासियों को मानसिक गुलाम बना रखा है। रामायण कोई सच्ची घटना नहीं है यह बात "सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने भी अपने ऐतिहासिक फैसले "सच्ची रामायण बनाम रामायण" नामक केस में भी मानी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आज भी मनुवादी लोग कहानियां बना-बना कर रामायण को सच्ची घटना साबित करने की कोशिश में लगे हुए। में है।
Comments
Post a Comment