आचार्य चाणक्य कहते हैं
#हमें कुछ समय के लिए आचार्य चाणक्य को अपना मार्गदर्शक बनाकर और अनुकूलनवादी रणनीति अपनाकर लोकतंत्र अथवा जनता की लड़ाई लड़नी चाहिए...
हमारा कहना है रक्षा भी होगी और हम अपना कार्य भी बख़ूबी कर सकते हैं...कार्य अर्थात आंदोलन या क्रांतिकारी अभियान आगे बढ़ा सकते हैं ।
चाणक्य यह भी कहते हैं कि शत्रु को शत्रु की ही नीति एवं हथियारों से परास्त करो ।
अनुकूलन और शत्रु की नीति...इन दोनों सूत्रों को मिला दें तो हमारे लिए एक शानदार रास्ता निकलता है...वह रास्ता है कि हम महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के पद से हटाकर गुरु रवींद्र नाथ टैगोर को राष्ट्रपिता बनाए जाने संबंधी आंदोलन छेड़ें...इस आंदोलन के लिए शानदार राष्ट्रीय तर्क हमारे पास है क्योंकि गांधी ने सरदार भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल इन तीनों के साथ बेईमानी और अनैतिक तथा राष्ट्र विरोधी व्यवहार किया...यह इतना बड़ा अपराध है कि उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि देना तो दूर सम्मान से याद करना भी इस राष्ट्र और यहां के जन-गण का अपमान है... उनका सम्मान इतना कर देने से ही हो जाता है कि उनकी समाधि का नाम राजघाट से बदलकर स्वराज घाट या अहिंसा घाट कर दिया जाए...
गुरु रवींद्र नाथ टैगोर प्रेमचंद के भी प्रेरणास्रोत थे और गांधी सहित सारे स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रभक्त उन्हें गुरुदेव कहते थे... अपने अंतर्राष्ट्रीय चिंतन एवं महान मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए उन्हें विश्वकवि भी कहा जाता रहा है...वे नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय भी हैं...और गद्य एवं पद्य में अनूठे लेखन से लेकर शांति निकेतन और रवींद्र संगीत तक उनके योगदान को देखते हुए भी उन्हें राष्ट्रपिता बनाए जाने का तर्क हर तरह से औचित्यपूर्ण एवं न्यायसम्मत है...
तनिक कल्पना कीजिए कि जब यह आंदोलन लेकर आप सड़कों पर उतरेंगे तो आपके भाषण एवं जनसंवाद में क्या बातें शामिल होंगी...आप भगतसिंह, सुभाष और पटेल के माध्यम से एक तो यह संदेश देंगे कि आपका आंदोलन विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय और देशज है... अर्थात इसमें मार्क्स-लेनिन-माओ की कोई ऐसी प्रेरणा नहीं है जिससे किसी को विचारधारा का ख़तरा है... दूसरे, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ-साथ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और डॉ. अंबेडकर, डॉ. लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश आदि नामों को जोड़ते हुए स्वतंत्रता संग्राम से लेकर परवर्ती काल तक इस देश में चलती आई लोकतंत्र और जनाधिकार की लड़ाई का इतिहास भी आप दोहरा सकेंगे...
यक़ीन मानिए, आपके इसी संभाषण एवं जनसंवाद से नवचेतना का संचार होगा और सच्चे अर्थों में स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक भारत का निर्माण होगा... अन्यथा फ़िलहाल तो सीधे टकराने वाले रास्ते पर न तो बढ़ने की कोई सूरत है और न ही उससे कुछ ख़ास हासिल होगा...
स्वाभाविक है कि यदि आप महात्मा बुद्ध के सौम्य भाव को अपनाकर रचनात्मक भाषा में इस विषय पर अपना आंदोलन आगे बढ़ाएंगे तो सरकार के पास आपके विरुद्ध कार्रवाई करने का कोई तर्क नहीं होगा और यदि फिर भी ऐसा कुछ होता है तो देश की जनता ही नहीं विदेशों की जनता भी आपके साथ और आपके पक्ष में होगी ।
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